काममाश्रित्य दुष्पूरं दम्भमानमदान्विता: |
मोहाद्गृहीत्वासद्ग्राहान्प्रवर्तन्तेऽशुचिव्रता: || 10||
कामम्-काम-वासना; आश्रित्य–प्रश्रय लेकर; दुष्पूरम्-अतृप्ति; दम्भ–अहंकार; मान-अन्विता:-मिथ्या प्रतिष्ठा से भ्रमित; मोहात्-मोह; गृहीत्वा आकर्षित होकर; असत्-अस्थायी; ग्रहान्-वस्तुओं को प्रवर्तन्ते-पनपते हैं; अशुचि-व्रताः-अशुभ संकल्प के साथ।
BG 16.10: अतृप्त काम वासनाओं, पाखंड युक्त गर्व और अभिमान में डूबे आसुरी प्रवृत्ति वाले मनुष्य अपने झूठे सिद्धांतों से संसक्त रहते हैं। इस प्रकार वे भ्रमित होकर अशुभ संकल्प के साथ काम करते हैं।
काममाश्रित्य दुष्पूरं दम्भमानमदान्विता: |
मोहाद्गृहीत्वासद्ग्राहान्प्रवर्तन्तेऽशुचिव्रता: || 10||
अतृप्त काम वासनाओं, पाखंड युक्त गर्व और अभिमान में डूबे आसुरी प्रवृत्ति वाले मनुष्य अपने झूठे सिद्धांतों से संसक्त रहते …
Sign in to save your favorite verses.
Sign InStart your day with the timeless inspiring wisdom from the Holy Bhagavad Gita delivered straight to your email!
अतृप्त काम वासनाओं को प्रश्रय दे कर आसुरी वृत्ति वाले लोग अपने हृदय को अत्यंत दूषित करते हैं। वे पूर्णतया ढोंगी बन जाते हैं अर्थात् जो वे वास्तव में नहीं हैं वैसा होने का अभिनय करते हैं। उनकी मोहित बुद्धि अनुचित विचारों को ही अंगीकार करती है और उनका अभिमान उनमें यह भ्रम उत्पन्न करता है कि उनके बराबर कोई नहीं है। क्षणभंगुर सुखों की प्राप्ति के लिए उनकी बुद्धि तुच्छता, स्वार्थ और अभिमान से ग्रसित हो जाती है। इस प्रकार से वे शास्त्रों की आज्ञाओं का निरादर करते हैं और जो उचित है उसके विपरीत आचरण करते हैं।